संदेश

न कहना

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मैं कभी नहीं कहता मुझे किसी से मिलना है। मैं कभी नहीं कह पाऊँगा। यह दोनों बातें जितनी अलग दिखती हैं, उससे ज़्यादा यह मेरे भीतर गहरी धँसी हुई हैं। हम विपरीत ध्रुवों पर खुद को रच रहे होते हैं। इसे गढ़ते हुए यह पंक्ति हर उस पढ़ने वाले के अंदर घटित हो सकती है, जिससे मैं इधर कई दिन हुई नहीं मिला होऊंगा। समान रूप से दूसरी तरफ भी यही भाव जब इस तासीर में घुल जाएगा, तब देखना चाहता हूँ, वह सब कैसे होते जाएँगे? इस न कहने और मिलने के बीच जो जगह है, उसी के आस पास खुद को बनता हुआ देखता हूँ। वह सब भी जो मुझे मिलना चाहते होंगे, मुझे से मिलने, कुछ देर बात करने, बहुत सारे दिन मेरे साथ रहने की इच्छा से भर गए होंगे, वह भी मेरी तरह उस मेरी तरह हर दूसरे व्यक्ति को कुछ भी नहीं बता रहे हैं। यह अजीब किस्म का चुप्पापन कुछ ऐसी गंध छोड़ रहा है, जिसे मैं अपने इर्द-गिर्द महसूस कर रहा हूँ। इसमें एक अजीब से खालीपन के बाद उपजा कुछ है, जिसे देख पाना संभव नहीं है। वह इन पंक्तियों में ही कोई आकार ले रहा होगा। वह किस शक्ल का होगा, मुझे नहीं पता। पर इतना है वह इन पंक्तियों में अनदेखा नहीं रह जाएगा। कई अनदेखी चीज़ें ऐसे ही नज़र…

क्षण

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मैं कई दिनों से लिखने के लिए एक ऐसे क्षण की प्रतीक्षा में हूँ, जब यह लिखे जाने वाली घटना मेरे अंदर उसी तरह दोबारा घटित हो जैसे वह उस रात हुई थी। बिलकुल उन्हीं भावों से एक बार फ़िर भर जाना चाहता हूँ। लेकिन कोशिश करने के बाद भी मैं किसी युक्ति से उन पलों को अपने अंदर दोबारा घटित नहीं कर पाया हूँ। यह एक दुखद घटना की पुनरावृति नहीं है। यह किसी अनचाहे खटके से कहीं पहले उसे दर्ज़ कर लेने की मेरी छोटी सी इच्छा है। यह घटना किसी भी तरह से कुछ भी बदल देने का कोई दावा नहीं कर रही है जबकि इधर सब कोई न कोई दावा कर लेना चाहते हैं। यह इस भाव से मुक्त है। सच में, यह बहुत छोटी-सी घटना को लिख लेना है। जिसमें आगे कुछ भी घटित होता हुआ नहीं दिखाई देगा। यह न दिख पाना हमारी तंगनज़री होगी, इसलिए पहले ही सावधान किए देता हूँ।

माँ और मैं बहराइच से अभी चले नहीं हैं पर लखनऊ में हमारा इंतज़ार हो रहा है। बस को चलने में अभी थोड़ा वक़्त है। पूछने पर किसी ने कहा, चार पचीस पर चलेगी। पर वह वहाँ सोच रहे होंगे, बस चल पड़ी है। अभी थोड़ी में जरवल रोड पार कर जाएँगे और घाघरा घाट आ जाएगा। इस तरह कुल तीन घंटे बाद यह बस रामनगर, बाराबंक…

देखो

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बिन कपड़े वाली नंगी लड़कियों को देखो. उनके शरीर पर भी वही खाल है. उसके नीचे नसों में बिलकुल उसी तरह खून बहता है. नीचे उनका रंग लाल है. उनके भी फेफड़े हमारी तरह साँस लेते हुए हवा से भर जाते हैं. एक दिल उनके पास भी है. मूलतः हम एक ही हैं. फ़िर भी हम उन्हें देखने की इच्छाओं से भर गए हैं. इसे ख़ुद से एक सवाल की तरह पूछना चाहता हूँ. क्यों हम उनके स्तनों और नितम्भों को देखना चाहते हैं? उनकी फिसलती सी लगती पीठ पर क्यों फिसलना चाहते हैं. उनकी बिन बाल वाली काँखों में झाँककर दुनिया देखने का सपना हम कहाँ से लेते आये हैं. उनकी नंगी जाँघों पर सिर रखकर लेटे रहने की कामना हम कैसे अपने अन्दर बेल की तरह उगने देते हैं? उनकी महकदार बाँहों पर अपनी खुरदरी उँगलियों से क्या लिख लेना चाहते हैं? शायद हम उपभोक्ता बन गए समय में एक खिड़की के सामने बैठे उन्हें देख रहे हैं. मैंने नहीं देखी हैं, उनके आँखों में भूख. भूख जैसे ही सारी बातों में शामिल होती है. बात बात न रहकर कुछ और बन जाती है. उस दबाव में हम अपने चेहरे बचाने लगते हैं और उन परतों के नीचे कई महत्वपूर्ण सवाल सवाल की तरह बचे रह जाते हैं. मैं इन पंक्तियों को सिल…

अनुपस्थित

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मैंने कई जगहों से ख़ुद को अनुपस्थित कर लिया है. मेरे जैसे कई लोग और भी होंगे, जो कभी-न-कभी ऐसा किया करते होंगे. यह गायब कर लेना, किसी भी तरह से पलायन नहीं माना जाना चाहिए. यह गायब हो जाना इस समय की सबसे बड़ी चालाकी है. वह सूरज भी तो हर शाम ढलने का बहाना बनाकर अनुपस्थित हो जाता है.  कोई उससे तो नहीं पूछता. वह कहाँ चला जाता है.उसके जाने पर ही हम रात होते-होते चाँद को देख पाते हैं. तारें भी आसमान में बिखर जाते हैं. एक का जाना हमें असहज करता है पर प्रकृति में वह एक क्रम है. एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ सब एक के बाद एक होने के लिए अपनी तय्यारियों में लगे रहते हैं. सोचता हूँ, तब बहुत सी जगहों पर अब लौटने का मन नहीं करता. एक मन यह भी होता है. इस जगह पर भी आना अब बंद कर देना चाहिए. कोई भी तो नहीं है, जिसके लिए आया जाए. मन एकदम जहर हो गया है इधर. किसी को भी नहीं छोड़ रहा. एक एक कर सबसे बदला लेने के ख़याल से भर जाने के बाद ऐसा होना सहज ही माना जाएगा. किसी ने मेरा कुछ बिगाड़ा नहीं है. कौन किसी का कुछ बिगाड़ पाया है. पर फिर भी मन, उसे ऐसे ही होना है. बेसिर पैर के ख्यालों में डुबोते रहना. तैर मैं कभी नहीं पाय…

पहला सफ़ेद बाल

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बात हर बार रह जाती है. मैं इस बात को पिछले साल से दर्ज कर लेना चाहता हूँ. ड्राफ्ट में तारीख है, उनतीस अगस्त. दो हज़ार सोलह. तब से यह बढ़े नहीं हैं. दो ही हैं. यह दोनों मेरी उम्र बढ़ने के संकेत नहीं हैं. शायद यह उन बिताये दिनों के स्मृति चिह्न हैं, जिन्हें मैं भूलना नहीं चाहता. शायद हम सब अपने बिताये दिन भुलाना नहीं चाहते. कुछ होंगे, जो उम्र के साथ भूल गए होंगे, तब उनके सिर पर खिचड़ी बाल इकठ्ठा होकर उन्हें उनकी यादों में वापस ले जाते होंगे.  सब अपनी अपनी तरह से समझते है, यह मुझे इसी तरह समझ आ रहे हैं. सुबह नहाकर आता हूँ और आईने के सामने कंघी करते वक़्त यह दिख जाते हैं. चाँदी के तार की तरह. अभी तक मैंने किसी को बताया नहीं है. बस एक दिन यहीं बैठे-बैठे तुमने इन्हें खोज लिया था. इनकी खोज कहीं किसी के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने में कोई योगदान नहीं देती इसलिए इस बात को किसी को बताना ज़रूरी भी नहीं था. फिर मैं किसी तरह दशरथ भी नहीं हूँ, जिनके कान के बालों को देख तुलसीदास भविष्य की कथा कहने लग जाते. यह चुपके से मामूली आदमी के जीवन में घटित होने वाली उससे भी मामूली घटना थी. इसे बाकियों द्वारा सिरे से नज़…

ख़त सा पन्ना

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बहुत दिन हुए आपसे बात नहीं हुई. कभी ऐसे होना, खाली होने जैसा लगता है. इधर सच में यह बहुत महसूस होता रहा है, हम कुछ नहीं कर पाए. लिखने को लेकर अब ख़ुद को ज्यादा आश्वस्त नहीं कर पाता. लिखने को कम करके नहीं आँक रहा. एक प्रयोजनवादी विमर्श हावी हो जाता है. ब्लॉग रोल में देखता हूँ, तब लगता है, कोई तो मेरे साथ नहीं लिख रहा. जो तीन साल पहले स्थिति थी, उसमें बहुत परिवर्तन आया है. शायद हम सब हमउम्र रहे होंगे और ज़िन्दगी में एक साथ ज़िन्दगी के दबावों की तरफ बढ़ गए होंगे और इस कारण ब्लॉग पर नहीं लिख पा रहे होंगे. यह उसी पुरानी बहस में दुबारा घिर जाना है. प्रिंट में आने की तमन्ना के बाद सब सुस्त हो गए. प्रिंट मतलब उनके नाम की एक जिल्द आ गयी और उनकी रचनात्मक ऊर्जा का विलोपन शुरू हो गया. यह शायद सतह पर दिख रहा है, शायद इसलिए इस तरफ इशारा कर रहा हूँ. फिर आप वाली बात याद आती है. ब्लॉग को एक माध्यम की तरह देखना चाहिए और कौन उसे कब तक साथ रखकर लिखता रहे, यह उनका व्यक्तिगत चयन है. मेरा भी अब लिखने का मन नहीं है. बहुत टुकड़े-टुकड़े में लिख लिया.
लेकिन ऐसा नहीं है, अब कुछ बड़ा लिखते हैं टाइप ख़याल दिल में उठने लग…

रेलगाड़ी

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रेलगाड़ी कोई सुविधा नहीं दे रही. ऐसा नहीं है. वह अभी भी ज़मीन पर बिछी हुई पटरियों पर भागने की पूरी कोशिश करती है. वह कोशिश करती है, कैसे भी करके उन डिब्बों में बैठे लोगों को उनकी तय जगहों पर वक़्त के दायरे में पहुँचा दे. जो जा रहा है, वह भी उसी तरह साथ बिताये दिनों में डूबने लगता है. वह इसी तरह सबको लाती है. ले जाती है. उसका यही काम है. इसी को वह ठीक से करना चाहती है. अभी जब रेलगाड़ी प्लेटफ़ॉर्म से चली जायेगी, तब हम दोनों भाई थके हुए पैरों के साथ वापस घर लौटेंगे. यह सारी बातें मैंने परसों रात नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर सोलह पर खड़े-खड़े नहीं सोची. ट्रेन आने में अभी वक़्त था. जब किसी को छोड़ने स्टेशन पर जाओ, तब अन्दर से अजीब सी हरारत होने लगती है. खून एक दम ठंडा हो जाता है. मन बेचैन सा होने लगता है.

इस रेलगाड़ी की स्मृतियाँ बचपन से हमारे अन्दर घुल रही हैं. हम कभी गोंडा से नहीं आये. हमेशा बहराइच से बस पकड़कर चारबाग, लखनऊ के लिए निकलते और रात प्लेटफॉर्म पर चादर बिछाकर खाना खाते. लखनऊ मेल तबतक सामने लग जाती. थोड़ी देर बाद हम उठते और उसमें दिल्ली के लिए बैठ जाते. कोई सुबह उठता नहीं…

लिखना

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इसकी कोई वजह नहीं मिल रही. लिखना कम क्यों हो गया? शायद ऐसा सबके साथ होता होगा. हमारी आदत से काफ़ी चीजें निकलती रहती हैं. हम ताप महसूस करें, तब भी होता है, लिखा नहीं जाता. मन कहीं और भागने को होता है. जैसे कभी कमरे से बाहर होकर वापस आने के लिए हम जाते हैं, वैसे ही लगता है, न लिखते हुए लिखने की तरफ लौटना चाहता हूँ. यह चाहना एक इच्छा है. छोटी सी इच्छा. जिसे पूरा करने के लिए कोई भी ऐसा काम नहीं कर रहा, जिससे यह लौटना हो पाए. कागज़ पर थोड़ा बहुत कहता रहा हूँ पर उसे यहाँ नहीं लगा सकता. यह डर नहीं है. यह डर से पहले का कुछ है. इसे संकोच भी कह सकते हैं. संकोच एक बेहतर शब्द है. पर इस्तेमाल नहीं करना चाहता. यह शायद अब मेरी बातों में ऐसा इकहरापन है, जो मुझे घेरे हुए है. ब्लॉग स्क्रोल करते हुए उसने कह दिया, यहाँ क्या लिखा हुआ है? जैसे लगता है, सब दुःख से ढक गया हो. दुःख का स्थायी भाव मेरे अन्दर मानसून की हवाओं की तरह नहीं है. असल में उसका कोई मौसम ही नहीं है. हम सब ऐसे ही होते रहते हैं. कोई कम, कोई ज्यादा. मेरे हिस्से यह ऐसा ही है. बेकार. बेतरतीब. बेवजह.

शायद मेरे अन्दर लिखने को लेकर इमानदारी भी कम…

वह कमरा घर था हमारा

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मैं पिछले कई दिनों से बार-बार उस कमरे में जा रहा हूँ, जो बचपन से हमारा घर था. इसे कमरा बोलना भी एक तरह से अपने अन्दर दूरी को उगने देना है. उस कमरे की सब पुरानी चीज़ें एक-एक कर किसी काम की नहीं रह गयीं. अब वहाँ हमारे वक़्त की कोई भी पहचान नहीं है. उन्हें वहाँ से हटाया जाने लगा है. हर दिन वहाँ कुछ न कुछ नया हो रहा है. नया पुराने को हटाकर ही आएगा, ऐसा नहीं है, पर इन दीवारों के बीच यह ऐसा ही है. इसमें एक तरह की यांत्रिकता है, जिसे वह पहले रहने वाले लोगों के साथ किसी तरह का सम्बन्ध बनाये नहीं रहने दे सकते. अगर वह पिछले की पुनरावृति होगा, तब उन चिन्हों से दावे निर्मित होंगे.  कोई नहीं चाहता ऐसा हो. कोई भी नहीं.

जब तक हम थे, याद नहीं आता पिछली बार जब यहाँ सफ़ेदी हुई थी, हम कितने छोटे थे. एक धुंधली सी याद में हम बस्ता टाँगे स्कूल से लौटे हैं और देख रहे हैं, सारा सामान एक खाली कमरे में रख दिया गया है. उस चूने की गंध फिर कभी नहीं आई. धीरे-धीरे पहले इन्हीं दीवारों में ऊपर छत से सीलन आई और एक वक़्त ऐसा आया, जब वहाँ दीमक ने झरते पलस्तर पर धमक के साथ वहाँ अपना घर बना लिया. हम सबका गर्दन ऊपर उठाकर ऊँट…

याद दोपहर

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अगर हम लिखना छोड़ दें, तब ऐसा नहीं होता कि हमने लिखना छोड़ दिया. होता बिलकुल इसके उलट है. लिखना हमें छोड़ देता है. मैं इस गरम होते शहर में छत पर एक कमरे में खिड़की पर परदा डालकर बैठा हुआ हूँ. बाहर आग उगलती हवाएं चल रही हैं. मेरे दिमाग में बहुत सी बातें चल रही हैं, पर उनमें से किसी को भी लिख नहीं पा रहा. बिस्तर इतना गरम है, जैसे अभी कुछ देर पहले कंक्रीट की छत अपने आप हट गयी हो और इसे भी अपनी चपेट में ले लिया हो. मेरी मेज़ पर आदतन बहुत सी किताबें बिन पढ़ी पड़ी हुई हैं. पढ़ने का मन बहुत सालों बाद इस तरह होता देख खुद को तैयार करने लगा जैसे. एक पैंसिल उठाई. कागज़ पर नज़र गयी. कुछ नोट कर लेने का मन हो गया, तब क्या करूँगा? दिवार से टेक लगता, इससे अच्छा होता मेज़ पर ही तकिया इस तरह रखता कि पीठ भी जल्दी नहीं दुखती. पर कौन सी किताब पढ़नी चाहिए? अनुवाद बहुत रखे हैं. अंग्रेजी से हिंदी. रामचंद्र गुहा, मार्क ब्लाख़, रोमिला थापर, अरुंधती रॉय. निवेदिता मेनन, लाओत्से. कौन सी? एक किताब फेनन की भी है. समझ नहीं आ रहा. सब आपस में गुत्थम गुत्था हो रही हैं. उठा किसी किताब को नहीं रहा हूँ. बस दूर से देखे जा रहा हूँ. कि…

पीछे जाते धागे

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यह बड़े दिनों से मेरे अन्दर उमड़ती-घुमड़ती हुई कई सारी बातों के सिरों को पकड़ने की कोशिश है. इसे मैं अपने में वापस लौटने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहता हूँ, पर पता नहीं कितना इसके लिख लेने के बाद कह पाऊंगा? बात सिर्फ एक तरह के लिखने की नहीं है. यह उससे कुछ ज्यादा की मांग करने जैसा है. जैसे मैं करनी चापरकरन लिख रहा था और उन दिनों की अपनी बनावट बुनावट की तरफ देखता हूँ, तब लगता है, उस दौर में जो छटपटाहट अपने अन्दर महसूस करता था, उसे खुद ही ख़त्म कर दिया. यह उन लिखी हुई बातों से कहीं न पहुँच पाने की खीज रही होगी. इन दिनों का दुःख उन पंक्तियों में झलकता हुआ, मेरे बगल दिख जाता होगा. वह अन्दर की बेचैनी पता नहीं किस कदर मुझे गढ़ रही थी. मैं डायरी पर. पैन से. यहाँ टाइप करता हुआ. मन के अन्दर अनगिनत अन लिखे पन्नों को समेटे हुए चल रहा था. जितना सर से उतारता उतना ही उसका वजन बढ़ जाता. लगता, अभी इस जेब से कुछ सामान बाहर रखा है, तो पीछे वाली जेब में कोई पौधा उग आया है. जहाँ आपको लग रहा था, जेब की सीवन फट गयी थी, वहीं कई सारी जड़ें इकठ्ठा हो गयी हैं. जो कहीं जाती नहीं हैं. वह सब अनायास आप तक आ गयी हैं.…

रुक्का

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दिल्ली की गर्मी में यह कुछ ऐसे दिन हैं, जब अखबार अगले तीन दिन भारी बारिश की ख़बरें छापते हैं. गमले अखबार नहीं पढ़ते. पानी न डालो तो सूख जाते हैं. प्यार भी पानी की तरह होता होगा. जब कोई साथ नहीं रहता, सिर्फ यादों में रहता है, तब जाकर एक ऐसा बिंदु आता होगा, जब उसकी यादें भाप बनकर हमारी त्वचा से बाहर निकलता हुआ हमें साफ़ दिख जाता है. यह एक दुखद पहलु है. पर यह वही यादें हुआ करती होंगी, जिनमें यादें नहीं होंगी. बादलों की अनुपस्थिति आसमान को भी इसी तरह रचती है. वह भी इंतेज़ार में नीला पड़ जाता होगा. मुझे पता है, मेरी बातें बीच में टूट रही हैं. पर क्या करूँ? टूटते हुए ऐसे ही लिखा जा सकता है. कभी वैसी ज़मीन देखी है, जो कढ़ाई की तरह गोलाई लेते हुए हो और ठीक सा गड्ढा भी न हो. उसमें जब बरसात का मटमैला पानी भरकर धूप में सूखने लगता है, तब दिखाई देती है, उसके नीचे की वह मुलायम मिटटी जो पपड़ी बनकर टूटने को होती है. वैसा हो गया हूँ. बिलकुल वैसा.उसके बीच में उभर आई दरारें उस इंतज़ार को गिनने के लिए काफ़ी हैं. मेरा लिखा हुआ भी उन दरारों सा है. जो अनलिखा है, उन्हें भी जोड़ लिया करुंगा. तब शायद यह इंतज़ार कुछ कम हो…

उदास आँखों वाली

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उसकी आँखें मुझे कहीं दरिया गंज के इतवार बाज़ार में सड़क पर पड़ी नहीं मिली थीं. न उन्हें लाल किले के पीछे लगने वाले चोर बाज़ार से खरीद कर लाया था. वह बाहर से मेरे अन्दर देखती हुई हर बार मिल जाती. वह वहीं थीं. माथे के पास भौहों के बिलकुल नीचे. उन्हें हर बार वहीं होना था. यह आँखों वाली लड़की हमेशा कहीं रोक लेती. रोक कर मेरी आँखों के बारे में पूछा करती. 

वह जब भी उदास दिखती, मैं सबसे पहले उसकी आँखें देखा करता. वह कहीं नहीं देख रही होतीं. उनमें सिर्फ़ मैं होता. यह होना मैंने चाहा नहीं था. फिर भी होता. क्या करता. बस चुप सा उसे देखता रहता. उनकी आँखों से आँसू भाप बनने से पहले आहिस्ते आहिस्ते गालों के पास बहते हुए आते. उनका होना  किसी पिघलती बर्फ की नदी की तरह शांत नहीं होता. वह बस उस दुःख के ताप से बहती रहती. उन बूंदों में ओस की ठंडक कभी नहीं थी. उनमें किसी की नाकामियों का दर्द दर्ज़ था. वह कुछ कहती नहीं. बस सब बता देती, उसकी आदत नहीं थी. किसी की चुगली करने की. फिर भी सब उसकी चुगली करती आँखें बता देती. 
इन सारी पंक्तियों के बाद इस आख़िरी पंक्ति में बस इतना कहना है, ऊपर लिखा सब झूठ है. और कुछ नह…

देखते हुए

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हम किन चीजों से घिरे हुए हैं, यह देखते रहना चाहिए. इससे एक तो इससे हम ख़ुद को स्थित कर पायेंगे और दूसरी बात हमें पता होगा, कौन से ख्यालों से हमें लड़ना है. यह संघर्ष की स्थिति दिखाई नहीं देती लेकिन होती आँखों के सामने ही है. यह दौर देखने का है. हम अपनी आसपास की दुनिया को इससे बाहर समझने के लिए राजी नहीं हैं. जितना हमें दिखाया जा रहा है, उतना ही सच हमारे लिए काफ़ी है. अगर यकीन नहीं आता तो अपनी भाषा में देखने को लेकर जितनी भी लोकोक्तियाँ और मुहावरे हैं, सबकी एक सूची बनाकर देखिये.

हम टीवी देख रहे हैं, हमारे सामने एक खिड़की खुलती है और हम एक घर के भीतर ख़ुद को पाते हैं. वह हमें नहीं देख रहे. हम ऐसी जगह हैं, जहाँ वह हमें कभी देख ही नहीं पायेंगे. यह घर किसी धारावाहिक का सेट होगा, जिसपर अभिनेता अभिनेत्रियाँ अभिनय से एक दृश्य रच रहे होंगे. ज़रा पिछली रात देखे गए किसी एक धारावाहिक की कोई एक मामूली सी घटना को उठाकर देख लीजिये, क्या वह हमारे आपके सामान्य घरों का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनकी वह कठिनाई या समस्या हमारे जीवन के निजी अनुभवों से मिलान नहीं कर पाती है. फिर हम क्यों उन्हें देख रहे हैं ? यह मन…

अगर मैं हीरो होता..

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मैं कभी किसी का हीरो नहीं बनना चाहता. इसे इस तरह लिखा जाना चाहिए कि मैं कभी किसी का हीरो नहीं बन सका. इस दूसरी पंक्ति के इर्दगिर्द ही ख़ुद को बुनने वाला दबाव इसे लिखा ले जाने वाला नहीं है. मैंने अभी तक किसी के लिए कुछ नहीं किया है. अगर किया है, तब उन सबको बारी-बारी मुझसे किसी तरह संपर्क करना चाहिए. मैं एक औसत से भी कम दर्जे की ज़िन्दगी जीता हुआ उसमें आगे बढ़ रहा हूँ. मेरी हैसियत एक पेड़ की तरह भी नहीं है. पेड़ कम से कम साल में साथ गुज़रते हुए मौसम के अनुसार अपना व्यवहार करता है. मैंने ऐसा कभी नहीं किया. यह आज मैं ज्यादा क्यों आ रह है? इसकी वजह है. लेकिन होता यह है, सारी वजहें बताई नहीं जाती हैं. मैं भी एक असामान्य सी सपनीली आँखों में डूबा हुआ इस दुनिया से बेखबर रहता हुआ इस दुनिया में रहना चाहता हूँ. यह कैसे होगा? नहीं पता. 
मैं चाहता हूँ, कुछ ऐसा कर दूँ कि मेरी मम्मी के घुटने एकदम ठीक हो जाएँ और वह हमारे साथ ख़ुद सीढ़ियाँ उतरते हुए, हमें नगर निगम के नल से पानी भरता हुआ देखें. कभी मन होने पर हम भी उनके साथ दो-दो बार बाहुबली देखने चले जाते. शीला सिनेमा के बंद होने से पहले न जाने कितनी फ़िल्में …