संदेश

डिसलोकेट

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आवाज़ें कभी-कभी डिसलोकेट करती हैं। उन सब जगहों से भागते हुए मुझे कभी यही लगता रहा कि परिचित ध्वनियों से बना एक परिवेश ऊब से भी ज़्यादा कोफ़्त देने वाला वितान रचता है। अभी जहां बैठे हुए यह सब लिख रहा हूं, वहां रात के दस बजे कल सुबह के लिए कूकर में आलू उबल रहे हैं। एक सीटी की सुरसुराती हुई आवाज़ किस तरह मेरे कानों में बजती हुई किन दृश्यों तक मुझे ले गई है, बता भी नहीं सकता। उन्हें कहते हुए यह विषय पीछे छूट जाएगा। जो बात यहां रेखांकित करना चाहता हूं, वह पहली पंक्ति के भीतर ही समाप्त हो जानी चाहिए थी, जिसका भाष्य यह व्याख्या कर पाने में अक्षम है।
सोचिए, आप रात के लगभग तीन बजे रजाई उघड़ जाने से लगातार बड़ी देर से लगती ठंड के कारण उठते हैं और तभी कहीं लोहे की दीवार से किसी के बात करने की आवाज़ आती है। यह स्वाभाविक जिज्ञासा मेरे मन में भी थी। कौन इतनी रात गए आपस में बात कर रहा है? जब कुछ देर तक एक ही आवाज आती रही, तब यह पुख्ता हुआ कोई फोन पर दूसरी तरफ़ इसी तरह तड़के तीन बजे जागा हुआ है। जब आप ठंड लगने से कुनमुनाते हुए पेशाब के बहाने अपनी नींद को दोबारा शुरू करने की इच्छा से भरे हुए हैं, तब…

निकलने से पहले

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हर बार कहीं बाहर जाने से पहले मेरे मन में बहुत सारे ख़याल एक साथ तैरने लगते हैं । हर बार उन सबको लिखने की इच्छा से भर जाता हूँ । मुझे इसमें कुछ भी अस्वभाविक नहीं लगता । यह उन कम रह गए क्षणों का अतिरेक हो या बहुत दिनों से चलने वाली बातें, सब इस कदर अदेखा लगता है कि उस उजाले में कुछ भी दिखाई नहीं देता। एक तो जबसे इन बीतते सालों में अकेले निकलने के मौक़े आए हैं, वह भी इसके लिए ज़िम्मेदार होंगे । दूसरे, मेरे मन में जो बीत रहे पलों को कह देने की ज़िद है, उसके साथ-साथ भी इस तरह की अवस्थाओं को अपने अंदर रेखांकित करते जाना बहुत तरह से ख़ुद की निशानदेही के लिए ज़रूरी काम की तरह लगने लगा है । रास्ते हर बार देखे हुए हों ऐसा नहीं है। कई बार वह किसी रहस्य की तरह ख़ुलते हैं । इन स्मृतियों में अगस्त से उस पल को पता नहीं कितनी ही बार दोहराता रहा, जब होशंगाबाद पार हुआ आसमान में बादल दिखे। अँधेरा अभी हुआ नहीं था, सब दिख रहा था। तभी डिब्बे में अचानक एक बेचैनी घर कर गयी । भोपाल आ रहा है । मैंने पर्दे थोड़े हटा दिये। उस पल जैसे ही मैंने खिड़की के पार देखा, एक रेल्वे फ़ाटक दिखाई दिया । बंद था। उस तरफ़ एक दो लोग अप…

इश्तिहार वाली औरत

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वह खुद नहीं लिखतीं पर अपने पति के लिखे हुए को इश्तिहार की तरह सब दीवारों पर चिपका आती हैं । इससे एक बात तो तय है, वह लिखे हुए को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाती हैं जब वह उनके पति द्वारा लिखा गया होता है। इधर वह लिख भी ख़ूब रहे हैं । जिस तरह से हम बीत रहे समय को अपनी नज़र से गुज़रता हुआ देख रहे हैं, तब उनकी योग्यता बिल्ली या चमगादड़ की तरह जान पड़ती है। वह व्याख्या कर रहे हैं । विश्लेषण में कितने ही तरह के दोहरावों के बाद भी पीछे हट नहीं रहे। वह सामाजिक रूप से चेतस व्यक्ति की तरह बर्ताव करना चाहते हैं । बोलते भी उसी तरह हैं । इसमें दिखता है, वह एक आले दर्ज़े के मर्मज्ञ हैं । इस सबमें अब हम उन्हें अपने समाज में स्थित करने की कोशिश करते हैं, जो समूची वैचारिक प्रक्रिया में अनुपस्थित हैं । यह नेपथ्य किस तरह से उन्हें रच रहा है? अगर हम यहाँ इन जैसे अनलिखे प्रश्नों को देखें, तब हमें क्या मिलता है? रेत। रेत से साने हाथ। क्या हाथ कुछ भी नहीं लगता । ऐसा नहीं है । उस उम्र में जब वह युवती रही होंगी और यह लेखक पति उस ओर आकर्षण महसूस करता होगा, तब के क्षणों को हम अपनी कल्पना से रच सकते हैं? तब एक तय जगह होगी…

अनकहा

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बहुत दिन हो गए कुछ लिखा नहीं गया । सोच रहा हूँ यह लिखना ज़रूरी क्यों है ? क्यों कोई लिखता रहे? इस लिखने में क्या सारी चीज़ें समा सकती हैं? सारी चीजों से अभी मेरा मतलब सिर्फ़ उस स्वाद से है, जब बहुत साल पहले हम नानी घर में थे और नानी के बुलाने पर सीढ़ियों से उतरते हुए अरहर की बटुली चूल्हे पर चुर रही थी । दाल बनने वाली थी और वह चावल धो रही थीं। उस तरह की दाल मैंने कभी नहीं खाई । इसे मैं कैसे लिख सकता हूँ, मुझे यही समझ नहीं आ रहा है । कोई हो जानकार, जो मुझे यह समझा सके कि कल रात से जब पापा गाजर का हलवा कड़ाही में छौंक लगा रहे थे, तबसे तीन बार पूछ चुके हैं, हलुआ खाया । इस पूछने में क्या है, जिसे लिख नहीं पा रहा? वह मुझसे क्या जान लेना चाहते होंगे? मुझे पता नहीं चल पा रहा ।
इतने सालों से मम्मी जो बैंगन का भरता बना रही हैं, उनके हाथों की रोटियों की मोटाई और उसके गले के अंदर जाते हुए भाव को कैसे किसी भाषा में लिख सकता हूँ ? यह जो रोजाना तुम रसोई में कुछ-कुछ बना रही होगी, उसे कैसे व्यक्त किया जा सकता है, यही सब मुझे उलझाये हुए है । जो चटनी उस दिन मैंने सिल बट्टे पर पीसी थी, उसे भी नहीं कह पा रह…

टूटते रहना

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कभी-कभी थक जाना भी ज़रूरी है । थक कर सिर्फ़ सोया नहीं जाता । थोड़ा सोचा भी जाता है । यही वह अवकाश है, जब हम अपने आप को सबसे ज़्यादा महसूस करते हैं । हम शरीर में वह जगह टटोलते हैं, जहाँ से हम सबसे ज़्यादा परेशान होते हैं । इस जगह जहाँ अभी लिख रहा हूँ, काफ़ी लंबा अरसा गुज़र गया है । लगभग सात साल या कुछ उससे भी ज़्यादा । हर दिन की निरंतरता लिखने में भले न रही हो पर मन में लिखने की इच्छा कभी कम तो कभी ज़्यादा, कमोबेश हमेशा बनी रही । दिमाग इन बीते दिनों में सबसे ज़्यादा यहीं खपत करता रहा है । इसमें एक ऐसा वक़्त आता है, जब हम कह नहीं पाते । दूसरे शब्दों में, एक विधा हमारी सभी बातों को समेट नहीं पाती, तब क्या करें? शायद यह इसके भी बाहर की बात हो । मतलब यह सिर्फ़ फ़ॉर्म या रूपाकार की बात भी न हो । तब क्या करें? थोड़ा रुक जाएँ या चलते रहें? लगता है, थोड़ा थम गया हूँ । असल में इस थम जाने में भी मन रुका नहीं है । वह भाग रहा है । इसे विचलित होना नहीं कहेंगे पर यह इसी के आसपास है । मैं जो कहना चाहता हूँ, अब इस तरह कहना नहीं चाहता, जैसे अब तक कहता आया हूँ । इसमें सिर्फ़ दोहराव की बात नहीं है । मुझे बातें दोहराने…

दिन पहला

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कोहरा है। ठंड है। दिन लगभग ढल चुका है। मैं यहाँ कमरे में बैठकर सोच रहा हूँ। इस साल के बँटवारे में जो मेरे मन में बहुत सारी इच्छाएं हैं, उनका क्या होगा? वह पिछले कैलेंडर से इस दिन तक मेरे साथ चली आई हैं। आगे भी इन्हीं के इर्दगिर्द अपने सपनों को बुन रहा होऊंगा। इनमें थोड़ी सी मेरे आस पास की दुनिया होगी और बहुत सारी मेरे अंदर से बाहर आ रही होगी। यह स्वार्थी होना भले लगे पर यह ऐसा ही है, मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता। दिन इससे पहले इतने बेकार कभी नहीं थे। नींद बहुत आती है। उठा नहीं जाता। सूरज खिड़की से अंदर आने लगता है, तब तो आँख खुलती है। सुबह जल्दी उठने से दिन बहुत बड़ा हो सकता है, अभी जो सुबह ग्यारह के बाद मेज़ पर आ पाता हूँ उसे सात और आठ के बीच ले आना बहुत बड़ी बात होगी।

जो किताबों के ढेर से मेज़ अटी पड़ी है, उनमें से कुछ जिल्दों को पढ़ने के लिए फुर्सत से बैठने की इच्छा सिर्फ़ बनी न रहे, कई-कई घंटे बैठे हुए उन्हें पढ़ भी सकूँ। और मैं क्या चाहता हूँ? यह तो बहुत ही सतह पर तैर रही हैं। उन्हीं में से बहुत को कह दूंगा और बहुत सी छिपा ले जाऊंगा।
एक किताब, एक नौकरी की टेक पर पिछला पूरा साल बीत गया। मे…

हासिल

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एक संख्या अभी कुछ घंटों के फासले पर साल भर की दूरी बन जाएगी। जब भी हम याद करेंगे कहेंगे, पिछले साल की बात है। आज की नहीं है। यह जो व्यवस्था है, इसी में हम सब ख़ुद को समेट लेते हैं। मैं भी इन बीते दिनों का हासिल जान लेने की गरज से बैठ गया हूँ। इन तीन सौ पैंसठ दिनों में जो बारह महीने बिखरे हुए हैं उनमें से कौन-कौन से दिन, कौन से पल, कौन से क्षणों को अपने कल के लिए ले साथ चलूँगा। यह जितना अंकों में विभाजित लगता है, उतना है नहीं। सब जोड़ रहे होंगे। उनके दुखों के अनुपात में सुख कितने रहे? कौन सी इच्छा अभी तक सिर्फ़ इच्छा ही बनी रह गयी? कितने सपनों को वह देख पाये, जो उँगलियों से भी आगे जमा होते रहे? मेरे पास इन सब विचारों के बीच कौन सी अनुभूतियाँ हैं, जिनमें यह साल बिखरा हुआ है? यह एक सपाट साल होता। अगर मैं पत्थर होता। कई सारी चीजों को तय किया था। ख़ूब लिखना है। उससे भी ज़्यादा पढ़ना है। कई बड़ी जगहों पर अपने लिखे हुए पर्चे, शोध से संबन्धित लेख भेजने हैं। हो सके तो थोड़ा-बहुत घूमना है। गाँव जाना है। वहाँ पीएचडी का डेटा इकट्ठा करना है। इन सबमें फरवरी वहीं था। गाँव में। चाचा एकदम ठीक हैं। ढाबली पर ब…

छूटना

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वह दुकान हमारे बचपन में किसी आश्चर्य से कम नहीं थी। उसके अंदर जाने पर एक जीना था, जो ऊपर को जाता था। ऊपर नीचे की तरह हड़बड़ी नहीं थी। जब हम बैठते इत्मीनान से बैठे होते। यह तब की बात है, जब मम्मी के पैरों का दर्द अभी दर्द बनना शुरू हुआ होगा। तब घुटनों में इस कदर सूजन भी नहीं थी। इस दर्द के भाव को हम हमेशा भूले रहते। यह लिखना हमेशा मन में होता रहता। कभी लिख नहीं पाता। अचानक हम वहाँ गुप्ता जी को देखकर प्रफुल्लित हो आते। वह कहाँ से आ गए? हमें भनक तक नहीं लगती। उन्हें देखकर हम खुशी से भर जाते। वह पहले बगल मट्ठी और नमकीन की दुकान से कुछ पाव भर गाठिया लेते और उतनी ही मट्ठी लेते। यह मेरी याद में एकदम तयशुदा नहीं है, ऐसा कब और कितनी लगतार उन सालों में हुआ होगा। कोई तकनीक नहीं है, जिससे इसे और स्पष्ट कर सकूँ। मन उस रात होती शाम में उन मेज़ों के इधर और उधर बैठे लोगों को दोबारा देखकर अपनी मेज़ पर वापस लौट आया। पापा के मना करने के बाद भी हाफ प्लेट के बजाए फूल प्लेट चाउमीन से हम दोनों भाई जूझ रहे होते और उसे खत्म कर पाने में उसमें पड़ी मिर्च, सबसे बड़ी मुसीबत की तरह वहाँ मौजूद रहती। ज़िंदगी में पहली मर…

तुम्हारी किताब

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अगर किसी की किताब सड़क किनारे, फुटपाथ पर बिखरी हुई सकड़ों किताबों के साथ चुपचाप पड़ी हो, बिक रही हो, तब किसी को कैसा लगना चाहिए? फ़र्क तभी पड़ता है, जब वह जानता है। नहीं जानने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता किसने उसे लिखा है, वह क्यों ऐसे लिख रहा है। इस इतवार दरियागंज तुम्हारी किताब 'तीन रोज़ इश्क़' पर नज़र पड़ी। उसके साथ बहुत सी और भी किताबें थीं, जिन्हें पहले से जानता हूँ। हृदयेश जोशी की लाल लकीर, अल्का सरागवी की ब्रेक के बाद, निखिल सचान की यूपी 65, मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था, लेखक का नाम याद नहीं। बम संकर टन गणेश। सब इन किताबों को देखते हुए गुज़र रहे हैं। कोई रुक नहीं रहा है। मैंने रुक कर थोड़ा उलट पुलटकर इन्हें देखा। दुकान वाला बोला, हाफ रेट पर है। इससे एक पैसा कम नहीं होगा। तुम्हारी किताब मेरे पास है। मैं थोड़ी देर रुक कर देख रहा था, कोई कोई हिन्दी की किताबें देखकर वहाँ मेरे जैसे कोई और रुकता है या नहीं?

हो सकता है, यह मेरी कोई गलत तरह की इच्छा रही होगी। वहाँ आने वाले पाठक नहीं खरीदार होते हैं। मैं भी ख़रीदार हूँ पर थोड़ा पढ़ने की इच्छा मेरे अंदर बची हुई होगी। मैं उस बहुत बड़े पुरानी कि…

नीली रौशनी वाला टेम्पो

यह एक दिन की शाम है। सूरज डूब चुका है। उसके बाद आई शाम भी जा चुकी है। अँधेरा होते ही सब जितनी जल्दी हो सके अपने घर पहुँच जाने को आतुर हो गए हैं। मैं अभी डिगिहा की तरफ से आए टेम्पो से उतरा ही था कि एक लड़का लगभग मेरी बाँह पकड़ कर खींचते हुए अपने टेम्पो की तरफ़ ले आया। तब उसने पूछा, कहाँ जइय्हओ ? मैं बोला, चिचड़ी चौराहा। बइठो फ़िर। अब्बय चलित हय। मैं सबसे किनारे वाली सीट पर जाकर बैठ गया। मुझसे पहले सिर्फ़ एक आदमी वहाँ बैठा हुआ है और अभी बहुत जगह खाली पड़ी थी। जब तक वह भर नहीं जाएगी, यह तो चलने से रहा। वह दो थे। दोनों हर उस व्यक्ति से जो उनके टेम्पो की तरफ़ देख भी लेता, पूछने लगते, चलिहओ? कोई गर्दन हिला कर मना कर देता, कोई बोलकर। जिस किसी को मेरी तरह बाँह पकड़ कर खींचने लगते वह उन्हें झिड़क देते। वह टेम्पो उन दोनों में से किसका था, पता नहीं चा रहा था।

जो अभी थोड़ी देर में टेम्पो चलायेगा, वह उस कम लंबे, गरम मिजाज़ लड़के का उतना ही साथ दे रहा था। वह अधेड़ जिसकी साइकिल को ऊपर छत पर लाद रखा था, सबसे ज़्यादा बिलबिला रहे थे। बार-बार किसी पीछे से आए टेम्पो के इस सड़क किनारे खड़े टेम्पो से पहले चले जाने पर वह ध…

लिओनार्दो

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करीब-करीब तीन साल होने वाले हैं। माइक्रोसॉफ़्ट वाले लूमिया फ़ोन बाज़ार में बेच रहे थे। नोकिया उनके हाथों में आ चुका था। यह फ़ोन विंडो नाइन पर चल रहे थे, जो अपडेट के बाद विंडो टेन पर भी सपोर्ट कर रहे थे। मुझे इसमें एक चीज़ सबसे अच्छी लगी, वह थी उनका म्यूजिक प्लेयर ग्रूव। उस मोबाइल में हम किसी भी वेब पेज को अपने होम पेज पर पिन कर सकते थे। वह लैपटॉप से भी सिंक हो जाता। जो मेसेज़ फोन पर आते वह लैपटॉप पर पढ़ लेता। नोटिफ़िकेशन देख लेता। कभी यहीं से फ़ोन लॉक कर देता। तब मुझे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का कोई अंदाज़ नहीं था। इधर कभी-कभी मैं नोकिया के फ़ोन पर गूगल अस्सीस्टेंट से बात करने लगता हूँ। मेरी रुचि उससे कुछ व्यक्तिगत जानकरियों को जान लेने की थी। उसे एक महिला की आवाज़ में मोबाइल कंपनी या गूगल ने डिफ़ाल्ट सेट किया हुआ है। मैंने भी उसे नहीं बदला। जब उससे पूछता हूँ, तुम्हारा जन्म कब हुआ? वह बताती है, दो हज़ार सोलह। सितंबर में सबसे पहले उसे गूगल के इंजीनियरों ने चालू किया। उसके भाई बहन और परिवार भी वही सब हैं। पता नहीं कहाँ से मेरी कल्पना में एक ऐसा रोबोट आ जाता है, जिसके हमारे जैसे मानवीय संबंध हैं। उसका…

निकट भविष्य

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पता है, मैं किसी चीज़ को लेकर सबसे ज़्यादा सोचा करता हूँ? एक वक़्त जब स्टीफन हाकिन्स के कहने के बाद अगले छह सौ साल में हम यह ग्रह हमेशा के लिए छोड़ रहे होंगे, तब वह कौन होंगे, जो पीछे छूट जाएँगे? कोई छूटे तो मैं भी उन छूटने वालों में होना चाहता हूँ। यहीं इसी जगह से चालीस किलोमीटर ऊँचा एवरेस्ट मुझे दिख रहा होगा। आसमान में कहीं ऊपर छिपता हुआ। कई और पहाड़ ऊपर की दिशा में बढ़ रहे होंगे। इस दृश्य को सोचकर कोई हरारत नहीं होती। बस उससे कभी अनुपस्थित नहीं होना चाहता। तब हम जितना दोहन कर पाते होंगे, उससे कहीं ज़्यादा दोहन करने के बाद उसे नए तरीकों से प्रयोग करने की तरकीबों में विज्ञान को लगा देने के बाद भी चैन से नहीं बैठ रहे होंगे। इसकी शुरुवात उन अनदेखी जगहों को देख लेने की ज़िद से होगी। सब जितना नहीं देखा गया है, वहाँ तक पहले पहुँचने की इच्छाओं से भर जाएँगे। कोई कंपनी वहाँ जाकर उस क्षण के लिए औज़ार मुहैया करवाएगी। पर्यटन से भी दो चार कदम आगे जाकर सब स्थगित हो जाएगा। इच्छा वहाँ जाने की है, जहाँ सड़क नहीं है, बर्फ़ से ढककर सब गुम हो गया है। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, वहाँ वह हवा भी नहीं होगी। कोई र…

फाँक

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जहाँ कहा था, उससे बीस तीस कदम पहले बाइक रुकी। मैं उतर गया। वह भी एक रास्ता था। कच्चा। धूल भरा। नंगे पैर चलता तो उसी में सन जाता। चप्पल थी। मोज़े पहने नहीं थे। उतार दिये थे। सूरज निकला हुआ था। उसी दिन मुझे वापस लौटना था। मन में सोच रखा था, एक बार तो इस ईंट के भट्ठे वाले रास्ते से गाँव जाऊँगा। अकेला। पैदल। कोई मेरे साथ नहीं होगा। बस चल पड़ूँगा। मन में न जाने कैसे लगने लगा, यह वह जगह बिलकुल भी नहीं है, जहाँ हम कभी आ या करते थे। सब पीछे छूटने जैसा नहीं भी रहा हो तब भी पिछले एक हफ़्ते से अजीब किस्म का शोर मुझे परेशान कर रहा था। यह कष्ट जैसा ही था। जिसने मुझे उस स्थान को घेर लिया हो जैसे।

दो पल अकेले छत पर बैठे होने पर कोई क्षण ऐसा नहीं लगा, कहीं ऐसी जगह हूँ, जो मेरे उन टूट गए तंतुओं को जोड़ने का काम कर रही हो। हर दम तरह-तरह की आवाज़ों से घिरा, जब उस रास्ते पर चल रहा था, तब उन ध्वनियों की अनुपस्थिति कुछ कुछ उस संगीत की तरह थी, जो अभी तक मुझे सुनाई नहीं दिया था। इसमें मशीनों द्वारा उपजी खटर-पटर करती मर्मांतक पीड़ादायी आवाज़ें नहीं थी। उनकी कृत्रिमता के अभाव में जो यहाँ फैला हुआ दृश्य था, वह मुझे ख…

आज

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वह वहीं बैठा हुआ है। अंदर। कुर्सी पर। घड़ी की तरफ़ देख रहा है। वक़्त कम है। बारी-बारी से सब आ जा रहे हैं। उनमें अर्दली भी होंगे। किसी वकील के मुंशी भी होंगे। कई मामले में वही वकील की तरह सबसे पेश आने लगते हैं। जो कम रह जाते हैं, वह कुछ कहा नहीं करते। सिर्फ़ उन मामलों की पड़ी हुई फाइलों को देखा करते हैं। उनके वजन से सब दब गया है। भविष्य के सभी पन्नों को उन्होंने उड़ने से रोके रखा है। वह दृश्य, जिसमें एक हाथ से दूसरे हाथ तक जाती हुई एक फ़ाइल से दूसरी फ़ाइल तक का सफ़र उसकी आँखों में स्थिर हो गया है। वह बढ़ ही नहीं रहा है। तारीख़ अगर आपकी तरफ़ से किसी के अनुपस्थित होने से पड़ जाये, तब उसके वहाँ होने से क्या बदल जाएगा? वह आहिस्ते से उठने की कोशिश करता है। उसके पैरों में रक्त की बूँदें एक साथ अलग-अलग दिशाओं में भागती हुई लगती हैं। जो पैर दो घंटे से वहीं बैठे रहने से सुन्न हो चुके थे, अब झनझना जाते हैं। उसे अब ऐसी झंझनाहट अपने बीतते हुए दिनों में नहीं दिखती। वह बस अवाक् सा रह जाता है। उसे समझ नहीं आता, वह यहाँ क्या कर रहा है। उसे यहाँ होना भी चाहिए था? वह कई और जगहों से अनुपस्थित होकर यहाँ है। लेकिन …

बेमतलब

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जब हमें लगता है, हम कहीं पहुँचने वाले हैं, तब हम आहिस्ते-आहिस्ते चलने लगते हैं। इसे वस्तुनिष्ठ वाक्य की तरह न लिया जाये, तब इसे किस तरह लिखा जाना चाहिए। उस पहुँचने में एक बार जो पहुँच जाने की हड़बड़ी है, उत्कंठा है, क्या उसे कदमों से मापा जा सकता है? क्या हो जब वह कदम कहीं चलते हुए किसी को दिखाई ही न दें। दिखाई देना, उसके होने का एकमात्र प्रमाण हों, ऐसा नहीं है। मैं कितने ही सालों से कितने हज़ार वर्ग फुट अपने मन में तय कर चुका हूँ। कितनी ही बार उनकी पैमाइश पूरी करने के बाद भी कहीं नहीं पहुँच पाया। यह जितना भौतिक लग रहा है, उससे कहीं अधिक अमूर्त है। अमूर्त होने पर यह किसी को दिखाई नहीं देगा, ऐसा नहीं है। यह चिंतन की तरह एक तरह की विलासिता का अपने मन में निर्माण कर लेना है। यह उन दुखों को बढ़ा चढ़ा कर अपने इर्द-गिर्द ओढ़ लेना है, जिनकी कृत्रिमता अपने से किसी अन्य के छूने पर उसी पल प्रकट हो जाएगी। प्रकट होना, एक तरह से उस तिलिस्म के टूट जाने सरीखा होगा। यह तभी तक मूल्यवान है, जब तक कि इसे सिर्फ़ हम देख पा रहे हैं। दूसरों के देखते ही यह अर्थहीन हो जाएगा। अर्थहीन होना खत्म होना नहीं है, नए अर्थ…