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ईर्ष्या

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क्या मेरी असफलताएँ मेरे भीतर ईर्ष्या का निर्माण कर रही है? यह पंक्ति अभी एक मिनट पहले मेरे दिमाग में जुगनू की तरह टिमटिमाती हुई नज़र आई। दरअसल यह पंक्ति कम और एक सवाल ज़्यादा लग रही है। अगले ही पल तुम्हारे साथ न होने वाले इन दिनों में डूबता उबरता कहीं किसी साहिल पर कुछ देर संभलने की गरज से चुपचाप बैठा रहता हूँ। फ़िर लेटे-लेटे यह सवाल भी कौंधा कि घर में सबको देखना चाहिए, इस कमरे में अकेले बैठा मैं सारा दिन क्या करता रहता हूँ? मेरे इस कमरे में बैठे रहने की पूरे दिन की उपलब्धि क्या है? कई सारी बातें एक साथ दिमाग में गुज़र जाने की इच्छा से भर गयी हैं। शायद मेरी भी कुछ अनकही बातों की टोह लेती हुई अंदर कुछ तोड़ रही हैं। टूटने से कुछ नहीं होगा, ऐसा कह नहीं सकता। फ़िर भी इस भाव से भर जाना इसी तरह कर जाता है। इसकी क्या वजह हो सकती है? कोई एक वजह तो होगी। क्या कल जो नतीजा आया है, वही इस का सबसे बड़ा कारण नहीं है? इस बार भी परीक्षा में उस पार नहीं जा पाया। यह जो इस पार रह जाने वाली पीड़ा है, इसमें छटपटाने से कुछ नहीं होगा। इसी सबमें एक दिन ऐसा आएगा, जब मैं उन सबको खारिज कर दूंगा, जिन्होंने उन प्रचलित …

सुनना

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यह भी एक गुण है। गुण से भी पहले एक इच्छा है। यह प्रक्रिया कैसे संभव होती है? हम आपस में बात करते हुए अक्सर ऐसा करते होंगे। कोई ऐसा भी होगा, जिसे किसी बात को सुनने का मन नहीं करता होगा? यह मनमौजी होने से ज़्यादा असंवेदनशील हो जाना है। हम सुनेंगे, तभी जान पाएंगे, जो हमारे सामने है, वह हमें कुछ कहना चाहता है। वह क्या कह रहा है? जब हम अनुपस्थित होते हैं, तब भी सुने जाने की इच्छा से भर जाते हैं। सुनने की इस पूरी प्रक्रिया में एक पदानुक्रम है। कोई है, जिसे हम अपनी बात सुनाना चाहते हैं। यह सामंती विचार की तरह है। जंतर मंतर भी एक ऐसी ही व्यवस्था है। अब हमारे अधिनायक सुनना नहीं चाहते। वह हमारी दादी होते जा रहे हैं। पापा की मौसी हमारी दादी लगीं। जैसे हमारे द्वारा न चुने गए नेता हमारे नेता लगे। जब वह कहती हैं, तब कहती ही जाती हैं। सुनती नहीं हैं। सुनना चाहें, तब भी सुन नहीं पाएँगी। उनके कान अब सुनने लायक नहीं रहे। बुढ़ापा इतना है कि अब कान साथ नहीं देते। जंतर मंतर भी कान हैं। वह सत्ता की आबोहवा खराब कर रहे हैं। इसे हवा खराब कर रहे हैं भी पढ़ा जा सकता है। वह सब जो शीर्ष पर बैठे हैं, उनका बहुत ध्य…

गंध

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गंध मूलतः क्या है? यह अपने आप में एक मौलिक सवाल है। इसका उत्तर भी उतना ही मौलिक होने की अपेक्षा रखता है। हम कितना हो पाएंगे, कहा नहीं जा सकता। मैं इस पर बहुत जटिल तरीके से लिखना नहीं चाहता पर यह बात ही कुछ ऐसी है, चाहते न चाहते यह वहीं घूम जाती है। तब यह किसी को समझ नहीं आती। इस शुरूवात में ही हमें थोड़ा सा पीछे जाना होगा। इतना पीछे जहाँ स्त्री-पुरुष ख़ुद को नर और मादा के आदिम वर्गिकरण में स्थित पाते हैं। श्रम का विभाजन अभी हुआ नहीं है। धीरे-धीरे उसमें बारीक-सी रेखा बन रही है। हम कृषि के लिए जमीन के महत्व को समझ रहे हैं, जिसके फलस्वरूप कालांतर में स्थायित्व का भाव हमारे अंदर उगने लगेगा। तब यह स्थायित्व एक जगह लंबे समय तक रहकर परिवार और निजी संपत्ति का रूप लेने लगेगा। हम वापस अपने प्रश्न पर लौटते हैं। हमारे शरीर से किस तरह की गंध दूसरे व्यक्ति तक पहुँच रही होगी, जोकि क्रमशः नर और मादा हैं? वह इस गंध से हमारी तरफ़ आकर्षण महसूस करते होंगे? एक खास मिट्टी में काम करने के बाद हमारी त्वचा से एक गंध आ रही है। कोई शिकार करके लौटा है, तब उसका शरीर उस परिवेश को अपने अंदर समेटे हुए होगा। एक गंध सर…

न्यूटन

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दो अक्टूबर की शाम सवा छह बजे, अँधेरा होने से कुछ पहले इस झुटपुटे में मुझे न्यूटन का खयाल आ रहा है। मैं सच में किसी फिल्म पर लिखने से बचने लगा हूँ। अक्सर तब, जब उन्हें सिर्फ़ बहाने की तरह इस्तेमाल करने जा रहा होता हूँ। अभी, इस पल भी मेरे मन में न्यूटन नहीं महात्मा गांधी की बात याद आ रही है। मैं कहूँगा नहीं, उन्होंने संसदीय प्रणाली के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उसकी आलोचना की है। जो जानने के इच्छुक होंगे, वह 'हिन्द स्वराज' खरीद कर पढ़ सकते हैं। नवजीवन ट्रस्ट अभी भी उसे बहुत कम कीमत पर छाप रहा है। दूसरी बात, जो यह कह रहे हैं, यह फिल्म अरुंधति रॉय के विचारों का 'विजुवल पिक्चराइजेशन' है, वह भी इसे समझने में थोड़ा पीछे रह गए। यह फिल्म उनसे कितना प्रेरित है, इसे बनाने वाले अमित ही बता पाएंगे। फ़िर जब हम किसी वैचारिक आग्रह से इसे देखना शुरू करते हैं, तब वह विचार ही हमारी कसौटी बन जाएगा, तब उससे आगे जाकर हम देख नहीं पाएंगे। इसलिए थोड़ा सावधानी से बरतते हुए चलना होगा। तब भी हम यह दावा नहीं कर रहे कि हम खुद किसी विचार से प्रेरित नहीं हैं।
बहरहाल, फिल्म नूतन कुमार की है। एक क…

यह बात

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कमरे में रौशनी ज़रा कम है। एक ट्यूब खराब हो गयी है। मौसम बदल गया है। अँधेरा बाहर साफ़-साफ़ दिख रहा है। वह काला है। उसकी कालिमा में कुछ है, जो दिख नहीं रहा है। मुझे डुबो ले जा रहा है । मैं कई दिनों बाद जब यहाँ लौटा हूँ, तब सबसे पहले उन बातों को उतार देना चाहता हूँ, जो मेरे अंदर भर गयी हैं। वह कौन सी बातें हैं, जिन्हें कह दूँगा तो हल्का हो जाऊँगा? शायद बचपन की किसी स्मृति में हम इतवार गाँव वाले घर पर हैं। चार बजे दूरदर्शन पर पिक्चर आने वाली है। नाम कोई भी हो सकता है। शान, बंदिनी, सीता और गीता। या कुछ भी। एंटीना ठीक नहीं है। तभी टीवी स्क्रीन लहरा रही है। हम छत पर हैं, एंटीना ठीक कर रहे हैं। नीचे चाचा से बता रहे हैं। इधर इतना। थोड़ा उधर। हाँ हाँ, बस। अब ठीक है। यह दृश्य बिलकुल उल्टा भी हो सकता है। चाचा छत पर हों और हम सब नीचे टेलीविज़न को झिलमिलाते देख उन्हें कुछ कह रहे हैं। यह हमारे सबसे छोटे चाचा हैं। यही चाचा मेरे मन में कहीं अंदर धंस गए हैं। धीरे-धीरे चाचा हमसे दूर जा रहे हैं। डॉक्टर ने कैंसर बताया है। रिपोर्ट भी वही कह रही है। अभी पाँच तारीख को फ़िर लखनऊ जाना है। दिल्ली से उनकी रिपोर्ट ले…

दोनों

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जबसे लौटा हूँ, तुम दोनों पर लिखना टाल रहा हूँ। पता नहीं ऐसा क्या कह देना चाहता हूँ, जो कहा नहीं जा रहा? कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी । बहुत सारी छोटी-छोटी बातें होंगी । वह उस गाँव की तरह ठहरी होंगी, जहाँ इन दिनों तुम रह रहे हो । उसे उदासी नहीं कहूँगा । वह उदासी के करीब तो है, पर उदास नहीं है । वह एकांत जैसा कुछ है । तुम जब बाहर होते हो, तब वह घर के अंदर ही नहीं अपने अंदर उन सवालों को ढूँढ रही होती हैं । मैं इन अंदर जाती साँसों को पहले इतना नहीं महसूस कर पाता । जब अकेला था, तब तो बिलकुल भी नहीं । जब हम दो हुए तब मुझे समझ आया, जितना हम दोनों बाहर दिखते हैं, उससे अनुपात में कई गुना अपने अंदर खुद को बुन रहे होते हैं । इसमें धागा न चिटक जाए, इसका ध्यान रखना होता है । बहरहाल ।

कोई एक-दूसरे में कितना डूब सकता है, यह पहली बार मैंने अपने इतनी पास देखा । इसे तुम्हारे शादी के साल तो बिलकुल भी महसूस नहीं कर सकता था । यह भी एक गुण है । धीरे-धीरे हमारे अंदर विकसित होता है । वक़्त लगता है । पर हो जाता है । मेरे मन में तो था, इस बार हमारी न हो पायी बातों पर लिखता । पर नहीं । जब तुम घर पर नहीं थे । हमने…

दिन तुम्हारा

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जन्मदिन किसी का भी हो, उसकी सबसे कोमलतम स्मृतियाँ माँ के पास होती हैं । वह जो हमें नौ महीने गर्भ में रखती है । एक-एक क्षण अंदर पल रहे बच्चे के गर्भ से बाहर आने का इंतज़ार कर रही होती है । इस प्रतीक्षा में गेहूँ की सुनहरी होती बालियों की दमक भी है और उसे छूने की लालसा भी । आज तुम कितने साल के हो गए कल पूछ नहीं पाया ? तुमने बस इतना कहा, कल गायब रहना चाहता हूँ । तभी आज कोई बात नहीं की है । बस हमने तुम्हारे गायब होने में मदद की है । तुम्हारी यह इच्छा पता नहीं मुझे कैसा कर गयी है ? अँधेरा शाम ढलने के बाद छत पर बिखर गया है । कोई दिख नहीं रहा है । मैं बस इस क्षण में तुम्हारे बनने के सालों को याद कर लेना चाहता होऊंगा । बहुत सारी बातें एक साथ ऊपर गले तक आकर बाहर आ जाना चाहती होंगी । पता नहीं यह कैसा भाव है ? इसमें भावुकता भी है या नहीं कह नहीं सकता?

तुमसे तुम्हारे घर के छोटे-छोटे किस्से सुनते रहना चाहता हूँ । ख़ुद उन मुलाक़ातों में चुप रहने की इच्छा को अभी पास नहीं धरा है पर तुमसे कुछ कहलवाने के लिए उन किस्सों की तरफ तुम्हें जाते हुए देखना अच्छा लगता है । कोई है, जिसमें भावुकता बची हुई है । तु…

हत्या

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मुझे एक हत्या पर क्या लिखना चाहिए ? यह हत्या जिनकी एवज़ में की जाती है, जिन्हें ढाल बनाकर किसी को मारा जाता है, वह इस पर क्या कहना चाहेंगे ? यह दो तरह की दुनिया का टकराना है या जिस खोल से हत्यारे निकल कर आए हैं, उसे दुनिया कहा जा सकता है ? वह जो डर गए हैं, उनका डर स्वाभाविक है । उन्हें पता है, कोई ऐसा प्रति विचार भी है, जो उनकी आस्था के समानान्तर चल रहा है और एक शाम ऐसी भी आ सकती है, जब उनकी यह दुनिया भरभरा का गिर भी सकती है । कहीं कोई बारिश नहीं होगी । कोई बिजली भी नहीं गिरेगी । बस दीमक लग चुकी हैं । वह नहीं चाहते कि कोई उस दुनिया पर अपने तफ़सरे कहे । उन पर की गयी व्यक्तिगत टिप्पणियाँ एक ख़तरा हैं । वह किसी संभावित भविष्य में ऐसा नहीं होने देना चाहते ।

मुझे लगता है, अगर वह किसी युक्ति से हमारे अतीत में पीछे जा सकते, तब यह उन सबकी हत्या की इच्छा से भर जाते, जो इनके मुताबिक ठीक नहीं होता । मुझे यह भी पता है, उनके पास पीछे जाने के कई तरीके हैं । तभी हमें इसी क्षण से आगामी अतीत में होने वाली संभावित हत्याओं का इतिहास लिखना शुरू कर देना चाहिए । वह किसी की भी हत्या कर सकते हैं । वह कर भी …

कागज पर लौटकर

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इन दिनों मैं डायरी पर वापस आया हूँ । अच्छा लग रहा है । कागज़ पर यहाँ लिखने जैसी तकनीकी सुलभता नहीं है, फिर वहाँ लिखना अपने आप में चुनौती भरा अनुभव है । आप तरतीब से नहीं लिखते । लिखते हुए बस लिख रहे होते हैं । पता नहीं आपने यह अनुभव किया है या नहीं पर मेरे साथ यही होता है । जब मैं लिख रहा होता हूँ तो वह शब्द अंदर दोहरा रहा होता हूँ । उसे चुपचाप बोल रहा होता हूँ । इन शब्दों को सुनने में जो धैर्य है, वह यहीं महसूस किया जा सकता है । डायरी पर एक छूट है । यहाँ भी एक छूट है । दोनों दो तरह की छूटें हैं । एक में मन को थोड़ा अवकाश मिलता है । यहाँ हमें स्याही न भरने की आज़ादी है । वहाँ और भी कई बन्दिशें हैं लेकिन खयाल को कहने में जितनी दूर धागे जा सकते हैं, वह जाते हैं । यहाँ भाषा में कृत्रिमता तो नहीं पर एक तरह की दूरी का खयाल रख़ता हूँ । जो कह रहा हूँ उसके क्या-क्या मायने जा सकते हैं ? जब तक मेरे मन में है, वह किसी भी तरह रहे पर जब उसे बाहर आना है, एक तरह की सतर्कता बगल में बैठ जाती है । इसे सचेत हो जाना नहीं कह सकता क्योंकि वह ऐसा भाव नहीं है । फ़िर पता नहीं जो मैं यह सब कह रहा हूँ, उसको सही स…

इधर

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अगर मैं चित्रकार होता, तब अभी तक चाँद को घेरे हुए बादलों को दर्ज़ कर चुका होता। वह छितरे हुए हैं मगर चाँद छिप सा गया है। आसमान में रौशनी छनछन कर इस तरफ़ आ रही है। यह फ्रेम मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। क्या मैं भी कभी किसी को इसी तरह नज़र आता होऊंगा? मुझसे रौशनी आर-पार नहीं हो सकती। पर कहने के लिए ऐसे ही कह जाता। सितंबर की इन गरम होती रातों में इस मौसम को हमें इसी तरह लिखे जाने की कोशिश करनी चाहिए। इन कोशिशों में जो ब्योरे इकट्ठा होंगे, उन सबको मैं कभी ऐसी ही किसी रात को पढ़ जाऊँगा। जब मुझे पता नहीं चलेगा, बाबा पिछले हफ़्ते किसी दिन पिछवाड़े जाते हुए गिर गए। जहाँ गिरे हैं, वहाँ से कोई नहीं बताता, कितनी चोट लगी है। इसी गिरने के बाद उनकी भूख शायद कहीं चली गयी है। तीन दिन तक वह खाना नहीं खाते हैं। यह बादलों के उन बिखरे टुकड़ों की तरह हैं। इनमें कोई क्रम नहीं है। बेज़ार होना इसी को कहा गया है। दिल में कई बातें एक साथ अखर रही हैं। उनका अखरना काँटों की तरह चुभ रहा है। कितनी बातों को यहाँ कहा जा सकता है, उससे ज़्यादा ज़रूरी सवाल है, कितनी बातों को यहाँ नहीं कहा जा सकता। कहने के लिए लबादों की ज़रूरत होगी…

दो अलग-अलग बातें

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1. कभी-कभी सोचता हूँ, मेट्रो में यह दृश्य न जाने मेरी अनुपस्थिति में कितनी बार घटित होता होगा। यह कोई आश्चर्यजनक दृश्य नहीं है। बस इसमें होता यह है कि एक बैठे हुए लड़के के पास पिछले स्टेशन पर चढ़े बुजुर्ग व्यक्ति आकर खड़े हो जाते हैं। अब लड़का क्या करे? वह पास में बैठी या पास में खड़ी लड़की की तरफ़ देखता है। उसे लगता है, वह पहले से ही उसे देख रही है। बेचारा बैठा हुआ लड़का पहले ज़मीन में नज़रें गढ़ाता है, फिर चुपचाप शालीनता को अपने चेहरे पर ओढ़ते हुए, मुस्कुराकर अपनी सीट उन उम्र दराज़ व्यक्ति के लिए 'अंकल आप बैठिए' कहकर छोड़ देता है। मुझे तो यहाँ तक लगता है, हमें किसी भी अधेड़, बूढ़े व्यक्ति के लिए अपनी सीट नहीं छोड़नी चाहिए।

कभी हम यह सोचते हैं, उन्होंने यह कैसा समाज बनाया है? क्या कभी इसकी इस जटिल संरचना पर कोई प्रहार भी किया है? अगर किया होता, तब यह दुनिया शायद रहने के लिए कुछ बेहतर जगह होती। यह वही अकड़ में डूबे हुए लोग हैं, जो आज के लड़के-लड़कियों द्वारा अर्जित स्वतंत्रताओं पर औपचारिक अनौपचारिक रूप से अनर्गल बातें किया करते हैं। ऐसे पुरुषों की वजह से ही हम पता नहीं कितनी अंतर्विरोधी ज़िंदगिय…

मोहन राकेश की डायरी

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कोई किसी किताब का कितना इंतज़ार कर सकता है, कह नहीं सकता। मेरा यह अनुभव अभी तक सिर्फ मुझतक सीमित है। मोहन राकेश को मैंने उनके नाटकों से नहीं जाना। उनकी डायरी से मिलकर मुझे लगा, यही वह व्यक्ति है जो मुझे, मुझसे मिलवा सकता है। यह बात रही होगी ग्रेजुएशन के खत्म होने वाले साल की। तब व्यवस्थित तरीके से लिखना शुरू नहीं किया था। कुछ भी नहीं। डायरी की शक्ल में तो बिलकुल भी नहीं। मोहन राकेश की डायरी ने बताया, लिखना सिर्फ लिखना नहीं होता। मैं सोचता, अगर यह डायरी अपने पास रखने के लिए मिल जाये, तो क्या बात होती। यह कोरी भावुकता में लिपटी हुई व्यक्तिगत इच्छा नहीं है। बस कुछ था, जो ऐसा लगता रहा। साल बीते हम एमए में आ गए। एमए खत्म हो गया। मोहन राकेश का नाटक 'आधे-अधूरे' पढ़कर लगता रहा डायरी में इसके हवाले ज़रूर होंगे। पर कुछ कर नहीं पाया। कुछ करना था ही नहीं। छात्र अक्सर कुछ कर भी कहाँ पाते हैं? सब कहते 'आपका बंटी' मोहन राकेश के पारिवारिक ज़िंदगी की कहानी है। उसमें जो बंटी है, वही उनका बेटा है। मैं ऐसा कहते हुए कोई नयी बात नहीं कह रहा। बस उन बातों को अपने अंदर फिर से दोहरा लेना चाहता हू…

गाँधी के साथ एक दिन

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कोई भी व्यक्ति अपने देश काल से बाहर नहीं हो सकता, ऐसा नहीं है. हम कल्पना में अक्सर ऐसा करते हैं. सपनों में हमारे साथ यही होता है. हम उस वक़्त जहाँ खड़े थे, वह महात्मा गाँधी की समाधी के बिलकुल पास मुझे मिला. उसने गुजराती लहजे में मुझसे पूछा, 'यह क्या है’? यह पहला व्यक्ति था, जो मेरे सामने इन ऊपर कही सीमाओं से परे चला गया. उसने अपनी महिला साथी को पुकारा और कहा, 'रास्ता नीचे से है, ऊपर से नहीं’. उनके लिए यह दिल्ली आने पर घूमने की एक जगह है. शायद हम जगहों को पहली बार इसी तरह अपने अन्दर रचते हैं. यह 'घोषित' ऐतिहासिक स्थल उनके मन में कब 'स्थापित' होगा, कहा नहीं जा सकता? 
गाँधी नोट पर हैं, जो उनकी जेबों बटुओं में होंगे. जो उम्मीद करते हैं, उसके साथ विचार भी पहुँच रहे होंगे, वह अभी सोचना भी शुरू नहीं करना चाहते. उस पर ऐसी कोई तथ्यात्मक बात नहीं है, जो बताती हो उनकी मृत्यु कैसे हुई थी? उसे मृत्यु नहीं हत्या ही कहा जाना चाहिए. जैसे यह सूचना रिज़र्व बैंक के किसी नोट पर नहीं है, राजघाट भी नोट बन जाता है. यहाँ ऐसा कोई सूचनात्मक बोर्ड नहीं है. यह स्थल अपने आप उम्मीद करता है कि…

टॉयलेट: एक प्रेमकथा

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यह फिल्म हमें किस तरह गढ़ रही है, यह सबसे पहले देखने वाली बात है। एक लड़का, जिसे अधेड़ कहना उचित होगा, उसकी शादी अभी तक नहीं हुई है। वह किस तरह प्रेम को अपने अंदर पाता है? कैसे प्रेम किया जा सकता है? उसके प्रेम को यह फिल्म 'प्रेमकथा' कहती है। यह कैसा प्यार है, जिसमें लड़का लड़की का पीछा करता है। साइकिल, मोटर साइकिल, बस, ट्रेन, टेम्पो, यातायात के सभी उपलब्ध साधनों से लड़की का पीछा ही नहीं करता, उसकी मर्ज़ी के बिना उसकी तस्वीरें उतारता है। उस तस्वीर से अपनी साइकिल एजेंसी का विज्ञापन बनवाता है। लड़की इस विज्ञापन को कस्बे में जगह-जगह देखती है और एजेंसी में जाकर अपना विरोध दर्ज़ कराती है। इस क्षण तक प्रेम का अंकुर उस लड़की में कहीं अंकुरित होता नहीं दिखता।

वह कब नायक पर रीझती है? जब उसे एहसास होता है, वह अधेड़ अब उसका पीछा नहीं कर रहा है। उसे अपने अंदर एक अजीब तरह का खालीपन महसूस होता है। जिसे हम दर्शक, जिसमें अधिसंख्यक पुरुष होंगे, वह किसी प्रेमकथा का आधार मान लें, तो क्या गलत है? हम सब एक पीछा करने वाले लड़के के लिए सहानुभूति से भर गयी लड़की को अपने सामने, बेचैन रातों में नींद न आने के कारण …

न कहना

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मैं कभी नहीं कहता मुझे किसी से मिलना है। मैं कभी नहीं कह पाऊँगा। यह दोनों बातें जितनी अलग दिखती हैं, उससे ज़्यादा यह मेरे भीतर गहरी धँसी हुई हैं। हम विपरीत ध्रुवों पर खुद को रच रहे होते हैं। इसे गढ़ते हुए यह पंक्ति हर उस पढ़ने वाले के अंदर घटित हो सकती है, जिससे मैं इधर कई दिन हुई नहीं मिला होऊंगा। समान रूप से दूसरी तरफ भी यही भाव जब इस तासीर में घुल जाएगा, तब देखना चाहता हूँ, वह सब कैसे होते जाएँगे? इस न कहने और मिलने के बीच जो जगह है, उसी के आस पास खुद को बनता हुआ देखता हूँ। वह सब भी जो मुझ से मिलना चाहते होंगे, मुझ से मिलने, कुछ देर बात करने, बहुत सारे दिन मेरे साथ रहने की इच्छा से भर गए होंगे, वह भी मेरी तरह उस दूसरे व्यक्ति को कुछ भी नहीं बता रहे हैं। यह अजीब किस्म का चुप्पापन कुछ ऐसी गंध छोड़ रहा है, जिसे मैं अपने इर्द-गिर्द महसूस कर रहा हूँ। इसमें अजीब से खालीपन के बाद उपजा कुछ है, जिसे देख पाना संभव नहीं है। वह इन पंक्तियों में ही कोई आकार ले रहा होगा। वह किस शक्ल का होगा, मुझे नहीं पता। पर इतना है वह इन पंक्तियों में अनदेखा नहीं रह जाएगा। कई अनदेखी चीज़ें ऐसे ही नज़र आ जाती हैं। …